एरण 

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एरण

ऐरण नामक ऐतिहासिक स्थान मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित है। प्राच्हीन सिक्कों पर इसका नाम ऐरिकिण लिखा है। ऐरण में वाराह , विष्णु तथा नरसिंह मन्दिर स्थित हुए है। भू विन्यास में वाराह मन्दिर का गर्भ गृह एक मण्डप से युक्त था। छत सपाट रही होगी। विष्णु मन्दिर चार ऊँचे स्तम्भों पर आश्रित है, इसमें गंगा और यमुना को गर्भगृह द्वार में दिखाया गया है। नरसिंह मन्दिर भी भग्नावस्था में है।

ऐरण की गुप्तयुगीन विष्णु प्रतिमा में गोलाकार प्रभा मण्डल, शैल के विकसित स्वरुप का प्रतीक है।

समुद्रगुप्त के ऐरण अभिलेख में लिखा हुआ है : ‘‘स्वभोग नगर ऐरिकरण प्रदेश...,’’ यानि स्वभोग के लिए समुद्रगुप्त ऐरिकिण जाता रहता था।

बीना नदी के किनारे ऐरण में कुवेर नागा की पुत्री प्रभावती गुप्ता रहा करती थी जिसके समय काव्य, स्तंभ, वाराह और विष्णु की मूर्तिया दर्शनीय है। इसकी समय पन्ना नागौद क्षेत्र में उच्छकल्प जाति कें क्षत्रियों का शासन स्थापित हुआ था जबकि जबलपुर परिक्षेत्र में खपरिका सागर और जालौन क्षेत्र में दांगी राज्य बन गये थे। जिनकी राजधानी गड़पैरा थी दक्षिणी पश्चिमी झांसीग्वालियर के अमीर वर्ग के अहीरों की सत्ता थी तो धसान क्षेत्र के परिक्षेत्र में मांदेले प्रभावशाली हो गये थे। 

सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण गुप्तकाल में मिलता है’’ ५१० ई.पू. के एक लेख से पता चलता है कि गुप्त नरेश भानुगुप्त का सामन्त गोपराज हूणों के विरुद्ध युद्ध करता हुआ मारा गया और उसकी पत्नी उसके शव के साथ सती हो गई थी।

श्री भानुगुप्तो जगति प्रवीरो, राजा महान्पार्थसमोडति शूरः।
तेनाथ सार्द्धन्त्विह गोपराजो, मित्रानुगत्येन किलानुयातःड्ड
कृत्वा च युद्ध सुमहत्प्रकाशं, स्वर्ग गतो दिव्य नरेन्द्रकल्पःड्ड
भक्तानुरक्ता च प्रिया च कान्ता, भार्यावलग्नानुगताग्निराशिम्ड्ड

Malhargarh

The only place of historical and architectural importance is the Pathrigarh – Hasangarh Fort which was founded during the Mughal era. It later came to be controlled by the Khinchi rulers and in the 17th century it was under Malhar Rao Holkar.

Displayed within the fort are 9 large cannons which would have been used in numerous battles and skirmishes during the many years of turmoil seen by the place in earlier times. Also within the fort complex are a large pond, a modern temple dedicated to Lord Hanuman as well as a Muslim saint’s mazaar. Within the village precincts is the Jain Taran Taaran Temple. 

मलहारगढ़
इस किले को मुग़लो द्वारा बनवाया गया था जो बाद में खिंची शाशकों और फिर मल्हार राव होल्कर के अंतर्गत रहा। किला प्रांगण के अंदर 9 तोपें भी हैं। मलहरगढ़ गाँव में ही जैन तारण तरण समाज का एक विशाल मंदिर भी है। साथ ही एक हनुमान मंदिर और एक मुस्लिम संत की मज़ार भी स्तिथ है।

                           Source:http://chanderi.org/2010/05/06/malhargarh/

Khimlasa Fort

Khimlasa is said to have been founded by a Mohammedan noble and was mahal in the sarkar of Raisen of the subah of Malwa. The town of Khimlasa is enclosed within a fortified wall built of stone rubble more or less coursed. 


In the centre of the towb is a bastion fort of which the gateways alone form an interesting feature. One one side of the fort is the dargah of the Panch Pirs, with an elaborately carved perforated screen work, which deserves an special mention.


खिमलासा को मोहम्मेदान द्वारा बसाया गया माना जाता है और यह मालवा सूबे के अंतर्गत रायसेन के सरकार के महल के रूप में बनाया गया था। आज भी खिमलासा कस्बा पत्थर की प्राचीन दीवार से चारों ओर से घिरा हुआ है। खिमलासा किले के एक तरफ पंच पीर की दरगाह भी है जो अपने अद्भुत कारीगारी के लिए जानी जाती है। खिमलासा बीना से 20 किलोमीटर की दूरी पर है...

इन एतेहासिक स्थानों के अलावा इस क्षेत्र में कई बड़ी औध्योगिक इकाईया भी हैं। 

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